अनकहे जज़्बात 👀🥹❤️

 कोई पढ़ कर  नज़रंदाज़ करता है 

तो कोई पढ़ने से भी एतराज करता है 

किसी को होती कदर मेरी 

तो वो मेरा लिहाज़ करता है 

किसी की बद्दुआ में मशरूफ़ रहता हूँ मैं 

तो कोई हर सुबह मेरा रियाज़ करता है 

यूँ तो ख़ामोश ही रहता हूँ मैं 

इतने सितम के बावजूद

मगर ये मेरे अंदर का जो क़लमकार है 

ये ही बेवजह अवाज करता है 

सोचता हूँ किसी को सुना दूँ मैं 

ये  हाल ए दिल मेरा 

मगर यहाँ तो सबको मेरा लफ्ज ही 

धोखेबाज़ लगता है 


नज़र आने लगी हैं मुझमें 

सारी कमियाँ तुम्हें

पहले कहाँ थी नज़र आयी 

कोई ख़ामियाँ तुम्हें 

हर रोज़  पढ़ती थी ना 

तुम ये आँखें मेरी 

फिर क्यों ना तुम्हें नज़र आयीं 

हमारी ग़लतफ़हमियाँ तुम्हें 


माना कि मौसम बारिशों का है 

कितनो की अधूरी ख़्वाहिशों का है 

 मनमर्ज़ियाँ भी चलेंगी यहाँ सिर्फ़ इश्क़ की 

जो ये मौसम भी तो इश्क़ की सिफ़ारिशों का है 


होकर वो किसी और की हर बात पर इतराने लगी थी 

जज़्बात से बिखरकर वो बात औक़ात पर आने लगी थी 

छोड़ दी हमने वो गली उसकी ख़ुशी में 

उसका मुझे छोड़ जाना भी उसकी मेहरबानी थी 

 कब तक चलती यूँ इश्क़ की वो लूका छुपी हमसे

आख़िर हक़ीक़त भी तो इक रोज़ सामने आनी थी 


ठुकरा कर मेरे दिल की हर सिफ़ारिश को इस कदर तुम किनारे हुए की ना दिल को ही मिले तुम और ना ही तुम हमारे हुए


किन शब्दों में बताऊँ तुम्हें मैं कैसे ग़म लेकर बैठा हूँ 

तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं होगा की मैं  कैसे ज़ख़्म लेकर बैठा हूँ 

मगर फिर भी तुम्हें फ़रेबी ही लगती हैं ये मेरी गमगीन आँखें 

और मैं कमबख़्त तुमसे हमदर्दी का वहम लेकर बैठा हूँ


हारना होता है किसी ख़ुशी में 

 या फिर किसी की ज़िद पे 

झुकना होता है 

यूँ ही ग़ुरूर दिखाने से 

या रूठ कर जाने से  रिश्ते नहीं निभते

 रिश्ता निभाना हो अगर तो रुकना होता है 


क्या करोगे तुम ये बात जान कर 

कैसे गुज़ारता हूँ ये रात जान कर 

हंसिल कुछ भी न होगा तुम्हें 

मेरी ख़ाक छान कर 

इसलिये मत पुछो तुम मुझसे

 वो बात जान जान कर 

क्यूँकि हैरान हो जाओगे 

तुम मेरे हालात जान कर 


उसे कोई हमदर्दी नहीं है मुझसे मगर मैंने ही ये वहम रखा है 

की उसने इस बार मेरी मोहब्बत की दहलीज़ पर कदम रखा है 

जज़्बात भी नहीं बचे अब मेरे दिल के अंदर वो जबसे आया है उसने ज़ख़्म कर रखा है हर रोज़ होती हैं यहाँ बारिशें उसने इन आँखों को भी नम कर रखा है मगर फिर भी उसी से मोहब्बत है मुझे वो जिसने हद से ज़्यादा मेरे दिल पर सितम कर रखा है 


टुकड़ों में क़त्ल 

ना करो मेरा 

मारना है मुझे तो 

सीधा मार दो ना 

क्यों खड़े हो तुम

 गहरी सोच में यार 

ख़ंजर लो हाथ में और 

मेरे सीने में उतार दो ना 


वो नासमझ है इतनी उसे बताया क्या जाए

करके इशारे इशारों में जताया क्या जाये

उसकी ज़्यादतें भी जायज़ हैं उसकी मासूमियत पर 

लिहाज़ा यही सोचता हूँ अब उसे सताया क्या जाये 


मेरी मोहब्बत का मुझसे 

तुम अंजाम मत पूछना 

और जिसने किया है मेरा ये हश्र 

तुम उसका नाम मत पूछना 

पूछ लेना मुझसे तुम मेरी

 खामोशियों की वजह 

मगर इस कदर क्यों हुआ हूँ 

मैं गुमनाम मत पूछना


किसने क्या कहा मेरे बारे में 

मुझे परवाह ही नहीं है 

मेरा दिल भर चुका है ख़्यालों से 

इसमें अफ़वाहों की जगह भी नहीं है 


तुम मिलो ना मिलो ये मर्ज़ी तुम्हारी है

हम ही उम्मीदें लगाये बैठे हैं 

लिहाज़ा ये ख़ुदगर्ज़ी हमारी है 


कुछ दूर तक ही सफ़र में मुसाफ़िर थे हम 

क्योंकि हमारी मंज़िलें भी अलग थीं 

किसी और की ख़ातिर थे हम 


शामिल जिस जिस के नाम में कुसूरवार हैं 

प्यादे वो सब के सब हैं सरकार के 

साबित तो तुम्हें करना है की क्या वो गुनहगार हैं 


मेरा अपना भी कोई किरदार है यार 

हर किरदार में मैं नहीं जच सकता हूँ 

कितना भी छिपा लूँ  

मैं अपनी हक़ीक़त लिबासों में 

मगर इस बार भी मैं अपनी 

असलियत से नहीं बच सकता हूँ 


इतनी उम्मीदों को मेरी तुम ढेर कर के 

यूँ ही चले गए ना मुझसे मुँह फेर कर के 

अब तो तनहाइयों ने भी सतना 

शुरू कर दिया है मुझे तुम्हारी 

यादों की तरह ही घेर कर के 


खड़ा तो हूँ मैं सड़क पर 

मगर जाना कहाँ है मुझे पता नहीं है 

किस सफ़र का मुसाफ़िर हूँ मैं 

मेरा ठिकाना कहाँ है मुझे पता नहीं है 


गुमनाम ही रहने दो मुझको मेरी हस्ती में 

मेरा किरदार जो ज़िंदा है तो मेरी सरफ़रस्ती में 

क्यों करना चाहते हो इसे बर्बाद यूँ ही ज़बरदस्ती में 

जीने दो ना मुझे मेरा किरदार मेरी मस्ती में 


फिर कभी इस मसले 

पर सवालात करेंगे 

खता तेरी थी या मेरी थी 

ये तय तब होगा 

जब मुलाक़ात करेंगे 

सुलह करेंगे इस बार 

हर मसले को हम

और समेट कर सारी 

हमारी उन ग़लतफ़हमियों को 

फिर से एक बार शुरुआत करेंगे 

हर मसले को ख़त्म करेंगे

 इस बार हम 

इस बार मिलकर जब बात करेंगे 


माना हमदर्दियाँ भी झूठीं हैं यहाँ 

मगर मसला तो उन 

आँखों की बरसातों का है 

जो तोड़ कर ख़्वाब फिर सोई नहीं 

मसला उन सब रातों का है 

कोई क़ुसूर नहीं इसमें उस बेक़सूर का 

क़ुसूर तो सारा जज़्बातों का है 

इश्क़ में बीती बातों का है 

इश्क़ में हुई मुलाक़ातों का है 


सर कलम कर दो मगर 

ये कलम मेरी सरेआम चलेगी

कितनों की हमदर्द बनेगी ये कलम

 तो कितनों को ये बदनाम करेगी 


इश्क़ में किसी एक के होकर देखना 

फिर बाद में खाओगे ठोकर देखना 

यूँ तो कहना आसान है कि भूल दो उसे 

कभी तुम भी किसी को खोकर देखना 


मैंने जो खामोशी तोड़ी तो आफ़त हो जायेगी

कितने ही बदनाम हो जाएँगे और 

कितनो से ख़िलाफ़त हो जाएगी 

उतर जाएँगे सारे नक़ाब हमदर्दियों के 

और इश्क़ वालों की तो नज़ाकत खो जाएगी 


उन नज़रों को भी चुभने लगा हूँ मैं 

जिनकी मैं राहत था कभी 

नफ़रत होने लगी है उन्हें भी मुझसे 

जिनके दिल की मैं चाहत था कभी 


उसे कभी फ़िकर ही ना थी 

की मेरा हँसना रोना भी उसके हाथ में था 

उसकी कमीं ने मुझे झकझोर रखा था 

मगर वो किसी और के साथ में था 


ये दुनियादारी मैं सारी की सारी 

छोड़ कर आ जाऊँ 

दिल तो चाहता है की  

वापस उसी मोड़ पर आ जाऊँ

छोड़ कर फ़िक्र 

फिर से इस जमाने की 

फिर वही ख्वाहिशें 

मैं जोड़ के आ जाऊँ 

कोई भी पाबंदी ना हो 

तेरे मेरे दरमियाँ

इस जमाने की हर बंदिश 

मैं तोड़ कर आ जाऊँ

सम्भाल लेना मुझको

 तू अपने प्यार की ओट में 

तेरी ख़ातिर जब मैं इस जमाने से 

मुँह मोड़ कर आ जाऊँ


जज़्बातों का यहाँ पर 

कोई अहम किरदार नहीं है 

फ़र्जी दिखावे हैं हमदर्दियों के

बाक़ी यहाँ कोई किसी का मददगार नहीं है 

बनावटी है ये जमाना और दिखावटी हैं लोग यहाँ के 

क्योंकि सच्चाइयों का यहाँ कोई दावेदार नहीं है 

सब के सब हैं प्यादे किसी वज़ीर के 

कोई भी शख़्स यहाँ पर ख़ुद्दार नहीं है 

और जिस्मों की ज़रूरतें हैं महज़ यहाँ पर

हक़ीक़त में तो यहाँ कोई प्यार नहीं है 


गुस्ताखी थी आँखों कि और दिल मजबूर था 

दिल आया भी उसपे जो बेवफ़ाओं में मशहूर था 

खेलता था जो जज़्बातों से जिसका दिल तोड़ना ही दस्तूर था 

उसी से दिल लगा बैठा मैं मेरा ये ही क़ुसूर था 


बेरहम है ये जमाना सो ये ज़ख़्म ही देगा 

छीन कर ख़ुशी तुम्हारी ये ग़म ही देगा 

उम्मीद ना करो तुम उससे किसी हमदर्दी की 

 जो पैदाइशी ज़ालिम है वो जुल्म ही करेगा 


सुनो एक बात तुम्हें हम राज की कहते हैं 

की फ़िकर तुम्हारी हम आज भी करते हैं 

हो चुके हो दूर तुम हमसे ये तुम्हारी मर्ज़ी 

मगर हम तो आज भी तुम्हारी याद में मरते हैं 


वो इश्क़ नहीं एक बहाना था 

जो छोड़ कर यूँ ही जाना था 

फ़िकर ही ना हो 

जिसे जज़्बातों की 

वो कहाँ से अपना हुआ 

वो भी तो एक बेगाना था 


सज़ा ही मिलती जो गुनहगार को 

तो फिर कहीं इतने गुनाह नहीं होते 

और मिलता इंसाफ़ यहाँ अगर बेक़सूर को 

तो यूँ ही बेगुनाह नहीं रोते 


पूछना तो था तुमसे मगर तुम  मेरे सवालों का जवाब नहीं दे पाओगे 

किस हद तक की है बेरहमी तुमने तुम हिसाब नहीं दे पाओगे 

तोड़ी हैं जितनी उम्मीदें और जीतने तोड़े थे तुमने वो ख़्वाब नहीं दे पाओगे 


हूँ ना मैं अजीब की यूँ ही ख़्यालों में 

ख़्वाहिशों की पुलिया बनाता रहता हूँ 

भुला कर मैं दुनियाँ के तमाम जश्न -ए -शोरगुल 

अपनी खामोशियों में ही 

अपने ग़मों की रंगरालियाँ मनाता रहता हूँ 


मैं ही हूँ वो बेशर्म जो हर ग़म को 

ख़ुशी की तरह ही मनाता रहता हूँ 

लोग तोड़ते हैं मुझसे रिश्ता हर बात पर

मगर मैं  हूँ जो बिन बात भी 

वो रिश्ता निभाता रहता हूँ 

और जो तोड़ जाते हैं लोग 

मेरे जाज़बात खिलौना समझ कर 

मैं ही बिलावजह उसे बनाता रहता हूँ 


इकलौती ये क़लम ही मेरे दिल के ज़ख़्म को समझती है 

ये दुनिया तो मेरी खामोशी ही नहीं समझती 

मगर ये कलम तो कम से कम  मेरे ग़म समझती है 

तुम्हीं करो ना ये फ़ैसला की कौन है मेरा हमदर्द यहाँ 

एक वो जो मेरी आँखों की गहराई में डूबी हुई है

या मेरी ये क़लम जो मेरी आँखें हैं नम समझती है 


मुद्दतों बाद एक बार वो मेरे पास में आये थे 

मगर अफ़सोस हुआ ये जान कर 

की वो किसी और की तलाश में आये थे 


किस ख़ुशी की बातें करते हो तुम 

जो मेरे आने से होती है

क्या महसूस नहीं की मैंने तुम्हारी 

वो ख़ुशी जो मेरे जाने से होती है 

अब तक था मैं इस फ़रेब में 

की तुम्हारी पसंद हूँ मैं 

मगर मुझे तो अब लगता है 

की तुम्हारी पसंद ही 

जमाने में हर फलाने से होती है 


क़ामयाबी ना हो जिसके पास में 

ये दुनियाँ उसे बदनाम करती है 

क़ैद करती है उसके ख़्वाबों को 

और उसको ग़ुलाम करती है 

फ़ितरत से मजबूर है ये दुनियाँ

लिहाज़ा वो ये काम करती है 


फ़ुरसत में मिलो तो गुफ़्तगू किया जाये

तुम्हारे लिए जो मेरे दिल में हैं जज़्बात 

वो सारी बात रूबरू किया जाये 


जिसका हाथ पकड़ कर 

मैंने चलना सीखा है 

बचपन में ही गिरना और संभलना सीखा है 

पूजना है मुझे मेरी उस माँ को 

जिनकी बदौलत ही मैंने हालातों में 

ढलना सीखा है और हालातों को बदलना सीखा है 


मेरी आँखों की गहराई में 

कहो ना तुम्हें क्या नज़र आता है 

मेरे दिल की बेबसी 

या जो बेबस करके गया 

वो नज़र आता है 


लिख लिख कर हमने हर बात कह दी थी 

इन्हीं अलफ़ाज़ों में हमने उसकी वारदात कह दी थी 

लोग तो छुपाते रहे थे शर्म से उसकी हर दास्ताँ को  

मगर हमने तो बातों ही बातों में वो उसकी करामात भी कह दी थी 


झूठी उम्मीद झूठी आस में जी रहे थे 

हम ही एक झूठे बिस्वास में जी रहे थे 

उसकी फ़ितरत में थी बेवफ़ाई 

और हम कमबख़्त वफ़ाओं की तलाश में जी रहे थे 


मैं लिखता रहता हूँ अपने हर विचार को 

कभी अपनी खामोशियों को तो कभी अपनी खार को 

कभी लिखता हूँ मैं अपने जीत का जश्न 

तो कभी लिखता  हूँ मैं अपनी हार को 


परिणाम बेहतर चाहिए अगर 

तो तुम्हें एक काम करना होगा 

की अपनी ग़लतियों के अफ़सोस पर 

तुम्हें पूर्ण विराम करना होगा 

इतनी आसान नहीं होती हैं ये उपलब्धियाँ

इन्हें हासिल करना है तो तुम्हें अपनी 

ख़्वाहिशों को नीलाम करना होगा 

और अपने संघर्ष को संग्राम करना होगा 


दिल में ही तुम्हारे महफ़ूज़ था मैं 

मगर तुमने तो वहाँ  

से भी निकाल दिया है 

झुठला कर तुमने तुम्हारे ही वादे 

वाह क्या कमाल किया है 


अब क़ैद रहने दो मुझे तुम मेरे ख़यालों के अन्दर

वो जो उजड़ गयीं मेरी ख़्वाहिशें उन्हीं के के मलालों के अंदर 

मत करना तुम मेरा ज़िक्र कभी अपने हवालों के अंदर 

अब क़ैद रहने दो मुझे तुम मेरे ख़यालों के अन्दर

तुम्हें महफ़ूज़ रखा था हमने अपनी यादों में  मगर

 तुमने तो तोड़ कर चूर कर दिया हमें अपने सवालों के अंदर 




मत पूछो मुझसे तुम वो 

हादसे तुम्हें कम ही लगेंगे

बेक़सूर तुम्हें वो और 

कुसूरवार तुम्हें हम ही लगेंगे 

मेरे ज़ख़्म तुम्हें वहम ही लगेंगे 

कितने भी गिना दूँ तुम्हें कम ही लगेंगे 


ख़रीदफ़रोस है कहीं प्यार की 

तो कहीं जज़्बातों को लूटा जा रहा है 

बस्ती है ये लुटेरों की जहां 

हमदर्दियों का गला घोंटा जा रहा है 


ना जाने क्यों हर शख़्स 

मेरा अपना हो जाता है 

फ़र्क़ नहीं करता फिर मैं औरों में 

वो अहम ही इतना हो जाता है 


चाहत प्यार की है तो मुझे प्यार ही चाहिए

मुझे मेरी खामोशियों का कोई हक़दार नहीं चाहिए

 हमदर्दी ही ना हो जिसमें वो तलबगार नहीं चाहिए

और दिखावे ही दिखावे हों जिसमें 

या गुमराह करने की फ़ितरत हो जिसमें 

वो तो मुझे एक बार भी नहीं चाहिए 


हाल ही में टूटा है मेरा दिल 

लिहाज़ा इसे थोड़ा संभलने दो 

 तोड़ लेना तुम मेरे ख़्वाब भी

 ज़रा ये शाम तो ढलने दो 


मैं जब भी मेरे ख़्याल पढ़ता हूँ 

मैं अक्सर ये स्वाल पढ़ता हूँ कि क्यों रखा है उसको सहेज कर 

मैं जिस ख़्वाब से हर बार उजड़ता हूँ 


ये ज़िंदगी आज भी 

उसी के इरादों पर चल रही है

टूट कर हो चुकी है तबाह 

उसके बावजूद उसी के 

वादों पर चल रही है


ख़ैर खामोशियों का मेरी मुझे इनाम मिल गया है 

मैं लिखने लगा हूँ अब मुझे ये काम मिल गया है 

तजुर्बा भी अच्छा है ये कि लिखने लगा हूँ मैं 

मुझे मेरे ज़ख्मों का इंतक़ाम मिल गया है 

करने लगा हूँ मैं अब उसके हर सितम को सारे आम 

जो मुझे अब उसका इंतज़ाम मिल गया है 


शुरू से शुरू करी 

जो हर कड़ी सुनानी

तो तुम्हारी इन आँखों में 

आएगी सुनामीं

ना जाने कितना 

दर्द समेट रखा है 

मैंने मेरे दिल के अंदर 

जो लिखने पर आ जाऊँ

 तो तुम्हें होगी हैरानी


कितना भी सम्भाल कर रखिए

 आप ये यादों के लिफ़ाफ़े

कुछ वक्त बाद देखना ये जल ही जाएँगे 

और आप जिनको ग़ुरूर से कहते हैं अपना 

वक़्त आने दीजिए देखना वो भी बदल जाएँगे 


हंसिल क्या हुआ है तुम्हें मुझको यूँ दूर करके

क्या तुम्हारे दिल को शुकुन मिल पाया है  

मेरी अधूरी ख़्वाहिशों को भी चूर करके 

तुम्हारी तरह मुझे नहीं आता किसी को भी 

छोड़ना यूँ मजबूर करके मगर तुम्हें 

ये किसने सिखाया था बताना कभी फ़ुर्सत में तुम

मुझको ये याद ज़रूर करके


झूठ के झाँसों में जी रहा था 

अज़ीब था मैं जो 

दिलासों में जी रहा था 

उसने नफ़रत की थी मुझसे भी 

और मेरी परछाईं से भी 

मगर मुझसे जो पूछो तो 

मैं उसके एहसासों में जी रहा था 


भूलने के इरादा तो नहीं है हमारा उन्हें 

मगर हालात कह रहे हैं की भूलना ही पड़ेगा 

आख़िर कब तक करेंगे

नज़रअंदाज़ हम सच्चाई को 

जो सच है उसे क़बूलना पड़ेगा 


बाक़ी सब तो फूल लगते हैं ना तुम्हें

 एक मैं ही हूँ जो तुम्हें छुरा लगता हूँ 

कितनी भी करे कोई ज़्यादती तुमसे 

मगर तुमको तो मैं ही बुरा लगता हूँ 


उतर जाने दो अभी दिल के बोझ जितने हैं 

कभी मिलेगी फ़ुरसत तो बता भी देंगे 

इक रोज़ कितने हैं 

फ़िलहाल फ़ुरसत ही नहीं अभी मेरे दिल को  

कमबख़्त इस दिल पर बोझ ही इतने हैं 


दुर्योधन की सभा है ये समाज 

और तुम द्रौपदी को बचाना चाहते हो

कृष्ण तो कब का छोड़ चुके हस्तिनापुर 

और तुम हो की कृष्ण को पाना चाहते हो  

प्रेम का पावन नाम हैं वो कृष्ण 

जिन्हें तुम स्वार्थवस पाना चाहते हो 

निश्चय ही कोई द्वेष है हृदय में तुम्हारे

 की कृष्ण ना मिले तुमको 

कहीं ये तो नहीं कि तुम उनके प्रेम के आधार पर 

इस संसार से तर जाना चाहते हो 


गुजर रही थी ये जन्दगी सूनी सूनी 

मगर फिर वो आये थे यादों की बारात लेकर 

कितनी ख्वाहिशें कितने ख़्वाब अपने साथ लेकर 

रातें गुज़ारी थीं हमने तारे गिनकर  

मगर वो तो आए थे दीवानी रात लेकर 

सिलसिला कुछ दिन का ही था ये प्यार का

फिर चले गये वो भी सब कुछ साथ लेकर 


आओ आँखों में आँखें डालकर बात करेंगे 

भय तृष्णा और संकोच इन सभी को 

हृदय से निकाल कर बात करेंगे 

आहत ना हो कहीं आपकी भावना कोई 

अपने हर शब्द को हम सम्भालकर बात करेंगे 


कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है 

या फिर मुझको ऐसा भरम कैसे हो सकता है 

दिल तोड़ कर मुँह फेर गया वो मुझसे

दिल के साथ मेरे ऐसा सितम कैसे हो सकता हैं 


ये कैसी मज़बूरी है मेरे दिल की 

की आपके बग़ैर डर लग रहा है 

मालूम है इसको की रह लेंगे तुम्हारे बग़ैर भी

मगर फिर भी ना जाने क्यों ये डर रहा है 


खुदको इतना 

मज़बूत बना लेंगे 

की अपने भीतर ख़्वाहिशों

 का ताबूत बना लेंगे 

तोड़ लेंगे हम ताल्लुक़ 

उसकी यादों से 

और ख़ुद को एक 

तरह का बुत बना लेंगे 


किसी ने ख़ाली तस्वीर देखी 

तो किसी ने तस्वीर में जज़्बात देखे 

सबका नज़रिया अपना अपना 

किसी को कलाकार की कलाकारी दिखी 

तो किसी को उसके हालात दिखे 


कुछ ही दूर है मंज़िल 

बस ये सोच कर तुम चलते रहो 

रास्ते मुश्क़िल मिलें या आसान 

कुछ देर रुको फिर चलते रहो 

हालात कितने भी बुरे हों सफ़र में 

तुम बस संभलते रहो और चलते रहो 


दबीं थीं जो तेरी यादें मेरे सीने में 

मेरा जीना हराम कर रहीं थीं 

टूट चुका था मैं तो कब का तेरे बाद 

उसपर तेरी यादें भी 

अच्छा अंजाम कर रही थीं 

हँस रहीं थीं मेरे हालातों पर 

और मुझे बदनाम कर रहीं थीं 

हर मोड़ पर ये दर्द का 

इंतज़ाम कर रही थीं 

थोड़ा भी रहम ना किया तेरी यादों ने 

मेरे दिल पर ये क़हर 

सुबह -ओ- शाम कर रहीं थीं 

तेरे बाद तेरी याद बस 

यही काम कर रही थीं 


नहीं होगा तुम जैसा कोई अगर 

तो हम जैसा कैसे हो सकता है 

तुम्हारी नज़र में तुम सही हम ग़लत

हद है यार ऐसा कैसे हो सकता है 



वो सारे दर्द तो तुम 

दिल में छिपाए बैठे हो 

फिर कैसे कह सकते हो ये तुम 

कि उसको भुलाए बैठे हो 


देख कर हालात इस जमाने के मैं सोचता हूँ 

की कैसे कैसे लोग मिल जाते हैं 

टूट जाते हैं यहाँ कई जन्मों के बंधन

तो फिर ऐसे कैसे सयोंग मिल जाते हैं 


रातों की नींद गवाएँ बैठे हैं

उसके बाद भी उसी से उम्मीद लगाये बैठे हैं 

उसने तो छोड़ दिया था कहकर अलविदा 

और हम उसे दिल से लगाये बैठे हैं 


बहुत अच्छा तुम ये 

काम कर रहे हो 

की अपने सारे क़ुसूर 

तुम मेरे नाम कर रहे हो 

खता तो ये सारी तुम्हारी है 

मगर तुम मुझे बदनाम कर रहे हो 

अजीब सी है मेरी बेबसी 

उसपे जुल्म तुम सरेआम का रहे हो 

देख कर तुम मेरी मजबूरी 

मेरे नाम  वो सारे तुम 

इल्ज़ाम कर रहे हो 


सब कमियाँ देखते रहे मुझमें 

मग़र था कोई एक ऐसा जिसे  

उन सब के  बावजूद मुझसे प्यार हो गया था 

सबकी नज़रों में मैं था एक आवारा सा लड़का 

मगर मेरी उस आवारगी का 

वो इकलौता तलबगार हो गया था 

किस किस की पसंद था मैं 

या किस किस को थी नफ़रत मुझसे 

इसकी मुझको खबर नहीं 

मगर वो ही था जो मेरा दावेदार हो गया था 

मेरे हर ज़ख़्म हर ग़म का हिस्सेदार हो गया था 

ठुकराया था जहां मुझे हर एक ने 

वहाँ वो ही था जो मेरा हक़दार हो गया था 

इतनी तमाम बातों को जब मैंने गौर किया 

तो सच कहूँ मुझे भी उससे प्यार हो गया था 


यूँ ही जज़्बातों को किसी के 

बेवजह बेज़ार ना करें 

निभाने का इरादा ना हो अगर 

तो किसी से प्यार ना करें 


सच कहूँ तो मेरे साथ में कभी इंसाफ़ नहीं हुआ है 

मगर जिसका क़ुसूर है मेरी नज़र में 

अभी भी वो माफ़ नहीं हुआ है 

बिक गयीं हैं यहाँ सारी अदालतें मगर 

मेरा भरोसा है जिस भगवान पर 

वो अभी भी मेरे ख़िलाफ़ नहीं हुआ है 

देख रहा है वो सब वहीं से 

जो मेरा साथ कभी भी इंसाफ़ नहीं हुआ है 


मिलना तुम फ़ुरसत में कभी 

तुम्हें वो सब मेरे ग़म दिखा दूँगा 

और वो सब जो लिखती है 

मेरी वो क़लम दिखा दूँगा 

झूठी ख़ुशियाँ तो 

जमाने को दिखायीं हैं मैंने 

तुम मिलो कभी तुम्हें मेरे

 ज़ख़्म भी दिखा दूँगा  

समझ सको तो समझ लेना 

तुम मेरे दर्द की गहराई

मैं मिलूँगा जब तो तुम्हें 

ये आँखें जो हैं नाम भी दिखा दूँगा  


इजाज़त दें आप अगर 

तो हम भी आज एक 

खुलासा करते हैं कि  

ये दुनियाँ वाले भी बड़े ही

 अज़ीब क़िस्म के होते हैं

ये  किसी की हार का 

जश्न मनाते हैं 

 तो किसी के अश्क़ का 

तमाशा करते हैं 


 कोई कहाँ है ऐसा आज कल 

कि बैठ कर  सुकून से 

दो बात कर सकें  

ना जाने किस दौड़ में

भागे जा रहे हैं यहाँ पर सब 

किसी को फ़ुरसत ही कहाँ है 

जो दो बात कर सके 

ढूँढ लिया मैंने सारा ये 

जमाना मग़र वो ना मिला कहीं 

जो बिना ख़ुदगर्ज़ी के वो बात कर सके 


देखो ना यार हर बार यही होता रहा है

जिस जिस ने किया प्यार वही रोता रहा है।

किसने कहा कि उम्रों की सौग़ात है ये प्यार

देखा है मैंने भी गहरायी से ये प्यार 

कि ये बस दो दिलों की ख़्वाहिशों समझौता रहा है 


पूछ लेते तुम हमसे ही जो

की वार कैसे करना है 

तो हम भी ना सीखते 

की तुमसे प्यार कैसे करना है  

कुछ भी न बचा अब इस रिश्ते में 

सिवाये अफ़सोस के 

लिहाज़ा अब जो भी करना है 

बस जैसे तैसे करना है 


एक ही सफ़र के हम दोनों ही मुसाफ़िर हैं

मगर फिर भी मैं थोड़ा मासूम हूँ 

और तू थोड़ी सी शातिर है 


जब भी पढ़ता हूँ 

मैं तेरी आँखें 

मुझे एहसास होता है 

की ये कोई राज

 समेटे हुए हैं 

पढ़ना भी बड़ा मुश्क़िल है 

इन आँखों को 

जो इतने गहरे ये 

अल्फ़ाज़ समेटे हुए हैं 


निभाओ ना निभाओ 

मगर तुम ये प्यार कहने देना 

की  मेरी उम्मीदों को 

यूँ ही बरक़रार रहने देना 

समेट लूँगा मैं अपनी ख्वाहिशें भी 

मग़र इन्हें इस बार रहने देना 

बड़ी शिद्दत से चाहता है 

कमबख़्त ये दिल तुमको 

इसलिए झूठा ही सही 

 तुम कुछ दिन के लिए 

इसकी ख़ातिर क़रार रहने देना 


नहीं समझ सके तुम हमें 

जो इतना कुछ कह दिया है 

ख़ैर छोड़ो अब क्या गिनाना

 की कितना कुछ कह दिया है 


क़ैद हूँ मैं किसी की आँखों में 

और आप सलाख़ों की बात करते हैं  

मुझे तो इकलौता वो ही चाहिए 

और आप हैं की लाखों की बात करते हैं 


मर्ज़ी ही नहीं है तुम्हारी अगर तो 

इस बात का क्या गिला करना 

ख़ैर छोड़ो जो मर्ज़ी ना हो तुम्हारी अगर 

तो फिर ना मिला करना 


सिल गये हैं लब ये अब 

कुछ कह नहीं पायेंगे 

है मजबूरियाँ भी ये ग़ज़ब की 

ये लब कुछ सह नहीं पायेंगे

ना जाने कैसे रह लेते हो तुम दूर इनसे 

मगर इनको है तुम्हारी तलब 

ये तुम्हारे बग़ैर अब रह नहीं पायेंगे  


भर गया है उनका दिल 

अब वो मेरे बग़ैर रहने लगे हैं 

कभी हम रहते थे 

उनके दिल के क़रीब 

मगर अब तो वहाँ 

सब ग़ैर रहने लगे  हैं 

नहीं रह सकते थे हम 

उनके बग़ैर एक पल भी 

मगर हालात ही ऐसे मिले 

की ख़ैर अब रहने लगे हैं 

कभी वो बुलाते थे 

मुझे यार अपना कह कर 

आज कल तो वो 

मुझे भी ग़ैर कहने लगे हैं 


आख़िर आँखों का 

दिल से क्या रिश्ता है 

आँखें जिसे पसंद कर लें 

दिल उसे पाने को तरसता है 

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