खामोश अल्फ़ाज़ ✍️📒❤️

 ना जाओ दूर हमसे की अभी भी बात बाक़ी है

पूरी ना हुई ये हमारी अभी भी मुलाक़ात बाक़ी है

ख़त्म नहीं हुई अभी भी तेरी यादों में रात बाक़ी है 

लिखने बैठा हूँ मैं मेरे जज़्बात बाक़ी हैं 

कुछ तुझसे कुछ ख़ुदसे अनकहे सवालात बाक़ी हैं 


मासूम है मेरा दिल जो वीरान रहता है 

शातिर है तेरा दिल जहाँ चहलक़दमी रहती है 

कितने के दिल टूटते हैं तेरे इश्क़ में 

और कितनों को तेरे इश्क़ में ग़लतफ़हमीं रहती हैं 


न चाह कर भी मुझे वहाँ जाना पड़ा 

तेरी यादें वहाँ छोड़ कर आना पड़ा 

ख़त्म हो चुकी मेरी सिफ़ारिशें तेरे इश्क़ की 

सो ये इश्क़ तेरा दफ़नाना पड़ा 

ना चाहते हुए भी तुझे भुलाना पड़ा 

खुदका दिल इस दफ़ा दुखाना पड़ा 



बातें बताना नहीं आता इसलिए बोलता भी नहीं हूँ

मेरी खामोशियों के भेद अब बेवजह मैं खोलता भी नहीं हूँ 

तुम ही रखो निगाहों में तराज़ू अपने 

मैं किसी का नज़रिया निगाहों में तोलता ही नहीं हूँ 


उसकी तलब में हम ये सब भी भूल गए 

वादों से मुकरने का सबब ही भूल गए

होश ही ना रहा की ये अब भूल गए 

इस क़दर हम हुए उसके की मजहब ही भूल गए 

ख्यालों में उसके ये कब भूल गए 

करना था जो ग़ौरतलब ही भूल गए 

उससे मिले तो दिल लगाने का मतलब ही भूल गए 


क्या कहूँ मैं इश्क़ में मेरा मुक़द्दर ठीक नहीं था 

इक तो मेरी ये बेचैनी दूसरा 

उससे बिछड़ने का वो डर ठीक नहीं था 

खुदसे नाराज़गी ठीक नहीं थी 

और इस क़दर भटकना दर-बदर ठीक नहीं था 


डरता हूँ ऐसे की तेजाब हो तुम 

लोग कहते हैं की गुलाब हो तुम 

इश्क़ की मुक़्क़मल किताब हो तुम

गुलशन हो तुम या महताब हो तुम 

इतना बताओ क्या ख़्वाब हो तुम 


नहीं रही अब कोई ग़लतफ़हमी 

जो उसका अब प्यार समझ आ चुका है 

करती तो थी वो हाँ 

मग़र उसका वो था इनकार अब समझ आ चुका है 


खता हो गई ये मुझसे अनजाने में 

तोड़ बैठा हूँ मैं दिल तुझको मनाने में

वक़्त लगेगा ये सब समझाने में 

दिल के दर्द तुझको दिखाने में 


मेरी मोहब्बत का मुझको अंजाम देखना था

कितना किसने दिया मुझे इल्ज़ाम देखना था

उसने तो सौंप दी अपने हिस्से की बेवफ़ाई 

अब मुझे भी मेरा इंतज़ाम देखना था 

सह गया मैं उसके सितम को हर दफ़ा बेवज़ह 

मग़र इस दफ़ा तो मुझे भी मेरा इंतक़ाम देखना था 

ग़ैरों की इनायत है वो या वो  मेरी इबादत है

उसके लबों से निकला जो पहला मुझे नाम देखना था 

करता मैं भी बहसबाजी तुम्हारी बेकार की बातों पर

मगर मुझे तो मेरा काम देखना था


ढेर हूँ खामोशियों का 

मैं ख्वाहिशों की राख हूँ 

अजीब इत्तेफ़ाक़ हूँ 

उजड़ चुका मैं ख़्वाब हूँ 

ख़ामियों की खायी हूँ मैं 

इश्क़ में भी ख़ाक हूँ 


अभिमान अहंकार से परे कहीं 

प्रेम की अपार अनुभूति होनी चाहिए 

इंसान हो अगर तो इंसानियत के 

आधार पर सहानुभूति होनी चाहिए 


लिखता हूँ मैं चंद अल्फ़ाज़ों को जोड़ कर 

दिल की गहराइयों से अपने जज्बातों को निचोड़ कर 

मत समझना इसे तुम शायरी जो  मैंने लिख दी है तोड़ मोड़ कर 

हर अक्षर वो रातें हैं जो लिखता हूँ नींदें तोड़ कर 


मन का कोहरा घना है माहौल बारिशों का बना है 

नमीं सी थमीं है कहीं ना कहीं इन पलकों पर 

किन शब्दों में कहूँ मैं खामोशियाँ जब कहना मना है 



इतंज़ार कर रहा था मैं तो बस तुम्हारे जवाब का 

तोड़ कर क़बसे बैठा हूँ मैं वो हिस्सा मेरे गुलाब का 

तुम उलझी पड़ी हो किसी के ख़यालों में 

मुझे भी भूलना है हर क़िस्सा उस ख़्वाब का 

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