खामोशी की आवाज़ 🥹✍️📒

 अहमियत ही नहीं 

समझते तुम मेरे 

जज़्बातों की तो फिर 

बोलो कैसे तुमसे 

प्यार कर लें 

हर बार मुकर गये 

तुम तुम्हारे वादों से 

तो इस बार  

तुम पे कैसे  

एतबार कर लें 


ठुकराया गया था हर बार मैं 

इसलिए इस मोड़ पर आया हूँ 

आफ़त ही था मैं सबकी 

इसलिए सबको छोड़ कर आया हूँ


सबको लत है 

प्यार की मगर 

निभाने कि आदत नहीं है 

यही वजह है 

अब प्यार भरे 

रिश्तों में 

वो हिफ़ाज़त नहीं है 


अहमियत नहीं है मेरी इसलिए 

मैं ख़ुद को बेकार समझने लगा हूँ 

झुठी हमदर्दी मिली है हमेशा मुझे इसलिए 

इसी को अब मैं प्यार समझने लगा हूँ 


मुझे मेरे किरदार का हिस्सा बनाना है 

फिर छोटी ही क्यों ना हो ये कहानी 

मगर मुझे इसका क़िस्सा बनाना है 



क़लमकार हूँ एक कहानी का मैं 

मगर एक किदार मेरे बेहद क़रीब है 

किसी की समझ में आया नहीं 

ये मेरा प्यार बेहद अजीब है 


पतझड़ बनकर गुजर रहा था 

हर एक लम्हा ज़िंदगी से 

तू सावन बनकर आयी थी 

एक रोज़ मेरी ज़िंदगी में 

बिछड़ कर भी बिछड़ने का इरादा ना रहा

आयी थी इक रोज़ वो घड़ी ज़िंदगी में 


आया हूँ फिर से 

आँखों में बरसात लेकर 

फिर से कुछ अधूरी 

सी याद लेकर 

हासिल ना हो सकी 

मुझे मंज़िल प्यार की 

लिहाज़ा मुड़ आया हूँ 

अपनी ख्वाहिशें 

अपने साथ लेकर 


जी लूँगा मैं ज़िंदगी 

जो तुम मेरी साँस बन जाओ 

सिल लूँगा मैं हर ज़ख़्म ज़िंदगी के 

जो तुम मेरे एहसास बन जाओ 

ज़्यादा ख्वाहिश नहीं है मेरे दिल की 

बस ये चाहता है की 

तुम्हीं ख़ासम-ख़ास बन जाओ 


क्या था तेरे तकिये तले 

जो तूने मुझसे छुपाया है 

क्या था वो ख़त कोई 

जो तूने मुझसे छुपाके जलाया है 

मैं ही हूँ तेरी आँखों का ख़्वाब कोई 

या मेरे बाद भी कोई और साया है 

क्यों है तू सहमी हुई 

और तेरा दिल क्यों घबराया है 

तेरी नज़रों ने कह दिया 

सब झूठ मुझसे मगर ये 

धड़कनों की रफ़्तार कह रही है 

की यहाँ कोई और भी आया है


यहीं पर हैं सब स्वर्ग नर्क 

सब कुछ यहीं पर ही देखा जाता है 

बाक़ी तो सब एक कहावत है 

कि ऊपर सब लेखा जोखा जाता है 


तरकीबें तो सभी ने सुझायीं 

मगर साथ किसी ने ना दिया 

इशारे सब करते रहे 

मगर हाथ किसी ने ना दिया 


दिल है ही टूटने की चीज़ 

इसलिए इसको 

टूटना तो बनता है 

इस बात पर भी 

अब इससे क्या गिला 

इसलिए इस नाचीज़ को भी 

रूठना तो बनता है 


हर बात वो मेरी हंस कर टाल देती है 

मगर उसकी ख़ामोशी मुझको मायूंसी में डाल देती है

पसन्द है मुझको उसका रूठने का रवैया भी 

वो रूठ कर अक्सर मुझको ब्लॉक लिस्ट में डाल देती है 


मेरे ख़्वाबों में कोई 

आने वाली नहीं है 

शायद इस जमाने में 

कोई दिल वाली नहीं है 

निकल चुका है दिवाला 

मेरी ज़िंदगी का 

इसलिए अब इस ज़िंदगी में 

कोई भी दिवाली नहीं है 


कभी तो तोड़ कर नींदें 

सारी रात मैं जागना चाहता हूँ 

तो कभी मूँद कर आँख  

ख़्वाबों में भागना चाहता हूँ 

कभी शिकायत है  मुझे 

लोगों की ख़ुदगर्ज़ी इबादतों से 

तो कभी मैं ही मेरी ख़ातिर रब से 

फ़लाँ-फ़लाँ मागना चाहता हूँ 


वो मिला था कुछ पल के लिए 

तो मानो मेरी पूरी तक़दीर बदल गई थी 

गुज़ार कर दो पल उसके साथ 

मेरी ज़िंदगी की पूरी तस्वीर बदल गई थी 


उसका मिलना उसका बिछड़ना

 सब तक़दीरों की बात है 

मगर मेरा तो सिमटना और 

बिखरना दोनों ही उसके हाथ है 


कुछ लमहें क़िस्से बनकर 

मेरी आँखों में समाने आ गये 

छोड़ आया था जो मैं 

यादें वक्त की दहलीज़ पर 

वो फिर से वापस मुझे थमाने आ गये 


ले जाओ तुम समेटकर मेरी ख्वाहिशें

 जो तुम्हारे बाद बेकार पड़ी हैं 

धड़कती नहीं हैं ये धड़कनें भी बेज़ार पड़ी हैं 

तरस रही हैं अब ये आँखें मेरी 

जो नींदें भी मान के हार खड़ी हैं 


कुछ बदलाव ज़रूरी होते हैं जैसे की साल बदलता है 

बदलती हैं तारीख़ें बदलता है कलैंडर 

जब वक्त अपनी चाल बदलता है 

छूट जाती हैं कुछ यादें गुजरते कल में

 तो कुछ उम्मीदों की सौग़ातों में हर साल बदलता है 

बदलते इस दौर में नया कुछ भी नहीं 

फिर भी नयी उम्मीदों की ख़ातिर फ़िलहाल ये बदलता है 


मत पूछ तू उसके सितम 

मेरे ज़ख़्म तो भर जाने दे 

ख़ुद ही दिख जाएँगे ये ज़ख़्म 

तू कम से कम इन्हें उभर आने दे 

शिकायत नहीं मुझे अब उसकी बेवफ़ाई से 

मुझे ही था ढेर सारा वहम 

सो उस वहम को तू मर जाने दे 


चार दिन की है ज़िंदगी तो 

इसमें इतना क्यों इतराना 

और आख़िर में जब मौत ही मुक़र्रर है 

तो फिर मौत से क्या घबराना 


सज़ा मुक़र्र न हुई मेरी मुझको  

बस तारीख़ों  में टाला गया है 

महफ़ूज़ था मैं तो क़ैद में भी 

उसके बावजूद मुझे 

वहाँ से निकाला गया है 


कुछ ख़ास ख्वाहिश नहीं होती 

हम जैसे इंसान की

ज़िंदगी कितनी भी बेरहम मिले

मगर मौत मिले इत्मीनान  की


हम भी अजीब हैं की 

अभी भी वो ख़्वाब लेकर बैठे हैं 

उसकी बेरुख़ी के बावजूद 

अपने दिल को बेताब किए बैठे हैं 

उसने तो मुकर कर फ़ासला तय कर दिया था 

मगर उसके बावजूद उसी के 

इंतज़ार में हम गुलाब लिए बैठे हैं 


निकलकर मेरे ख़्वाबों से 

तुम एक रोज़ मेरे सामने आओगे

मिट जायेंगी ये तनहाइयाँ जिस रोज़ 

तुम मेरे हाथ को थामने आओगे 

कितना गहरा है ये दर्द मेरे दिल का 

एक रोज़ इस दर्द की तुम गहराई छानने आओगे 

नहीं हो सकता जो लफ्जों में बयाँ मैं वो दर्द लेकर बैठा हूँ 

इस इंतज़ार में की इक रोज़ तुम ये जानने आओगे 


खिली है अभी धूप मेरे प्यार कि तुम्हारे ख़ातिर

फिर आयेंगे हम भी एक रात बनकर 

गुज़र जाएगा जब ये सावन तुम्हारे प्यार का 

तो फिर हम आयेंगे बरसात बनकर


बातें जो बता सकते थे 

तुम वो भी तो छुपाते रहे

फिर कौन सी वफ़ा थी 

जो हमसे तुम निभाते रहे 

हर मोड़ पर बिछाकर तुम काँटें 

ये कैसी हमदर्दी हमसे तुम जताते रहे 


समझौते मंज़ूर नहीं हमें फिर चाहे 

ख़्वाहिशों को मारना पड़े 

और हमदर्दियों का वो बोझ भी नहीं चाहिए 

जो एक मोड़ पर मज़बूरन उतरना पड़े




काबिल नहीं हूँ मैं आपके 

क्योंकि मैं तो बस ख़ाक हूँ 

हक़ीक़त से मेरा कोई वास्ता ही नहीं 

क्योंकि मैं तो बस इत्तिफ़ाक़ हूँ 


समझ में भी नहीं आता हूँ 

समझा भी नहीं पाता हूँ 

कुछ ख़ास मेरा क़िरदार नहीं 

बस यूँ समझ लो की छाता हूँ 

जो बारिशों के बाद बस पछताता हूँ 


देखना ये होगा की ये मसला

 और कितना टाला जाएगा 

मेरे हिस्से में आएगी रिहाई 

या मुझे क़ैद में डाला जाएगा 

ना होगी नज़रंदाज़ अब और उसकी बेवफ़ाई 

मुझसे अब और न वो सम्भाला जाएगा 


एक बात मुझे हर बार सताती है 

क्या इतना अनजान हूँ मैं उसके लिए 

जो हर बात वो मुझसे छुपाती है 


मत पूछना मुझसे कि अदालतों में क्या होता है 

हार जाते है मासूम मुकदमें वहाँ 

और क़ातिलों के हक़ में वहाँ फ़ैसला होता है 



सब ने रास्ते चुन लिए अपने मगर हम तेरे होकर रह गये 

मिल गयीं मंजिलें भी उन्हें और हम तुझे खोकर रह गये 

हंसते रहे वो मुझे देख कर मेरे हाल को 

मगर हमसे कुछ ना हुआ बस हम रोते रह गये 


मत पूछना मुझसे तुम मेरे हालातों को 

क्योंकि छोड़ दिया है अब 

मैंने जताना मेरे जज़्बातों को

वो बात अलग थी 

की मेरे दिल को  ख्वाहिश थी तेरी

मगर अब तो गौर ही करना छोड़ दिया मैंने

मेरे दिल की उन सब बातों को 


तेरा हाथ मैंने मेरे हाथ में देखा था 

कमबख़्त वो ख़्वाब ही टूट गया 

जो मैंने तेरे साथ में देखा था 


मैं ही इकलौता वो ज़रिया था 

जिसने बदला तेरा नज़रिया था 

छोड़ कर तू यूँ दूर हुई की फिर

 मेरी आँखों में बस दरिया ही दरिया था 


कहाँ तक करोगे काँटों से किनारा 

कभी तो इनको अपनाना पड़ेगा 

तलब जब होगी तुम्हें गुलाबों की  

तो इजाज़त इन्हीं से लेने आना  पड़ेगा


अजीब हूँ की उसी के इंतज़ार में बैठा हूँ 

फिर सोचता हूँ की आख़िर क्यों मैं 

ये मायुषी बेकार लिए बैठा हूँ 

नहीं है जवाब मेरे सवाल का कोई 

जिससे किनारा करने का इरादा किया था 

उसी की जासूसी और उसी से प्यार किए बैठा हूँ 


इन आँखों में हम 

प्यास लिये बैठे है 

मत पूछ की किसकी 

तलाश लिए बैठे हैं 

वैसे तो टूटी उम्मीदें और 

हौसले हतास लिये बैठे हैं

फिर भी वो मिलेगा किसी मोड़ पर 

ये मन में बिस्वास लिये बैठे हैं 


मत ढूँढ तू मेरी खामोशियों में कुछ 

वो तो बेहद बेहिसाब बड़ी हैं 

देखना है अगर तो मेरी ख्वाहिशें तू देख 

जो तुझे देखने को कबसे बेताब खड़ी हैं 


जल रही है चिता एक तरफ़ और 

एक तरफ़ राजनीति खेली जा रही है 

संगम था जहां प्रेम का 

वहाँ राजनीति धकेली जा रही है 


मेरी तरह ही कोई मेरा आदी चाहिए 

ऊब चूका हूँ मैं इन ख़ुदगर्ज़ों से 

मुझे अब इनसे आज़ादी चाहिए 


ये वहम ही तो है हमारा की हमको

 आज़ाद किया गया था 

जबकि क़ैद कर ली गई आज़ादी हमारी 

और हमें बेवजह बर्बाद किया गया था 


होश मत आने देना मुझको बेहोश रहने दो 

उड़ जाएँगे रंग चेहरों से कितनो के 

इससे बेहतर है की मुझे ख़ामोश रहने दो 


ठुकराना ही है जो आख़िर में 

तो आख़िर हमें अपनाया ही क्यों जाता है 

कोई इतना तो बता दो कि 

हम जैसों को इतना सताया क्यों जाता है 


ख़ामोश हो यूँ ही तुम या फिर कोई वजह है 

जो ये बेवजह है तो फिर ये भी बता दो 

की इन खामोशियों में क्या मजा है 


इश्क़ में ख्वाहिशों के समझौते होते हैं 

या फिर इम्तिहान लिया जाता है 

या यूँ कहूँ की सिर्फ़ जज्बातों को 

लहूलुहान किया जाता है 


हम भी उसी किनारे पर खड़े हुए थे 

झूठी उम्मीदों के सहारे पर खड़े हुए थे 

उसने गौर ही ना किया हमें 

हम उसके इशारे पर खड़े हुए थे 


कोई पूछना हमसे भी की प्यार क्या होता है 

टूटती हुई उम्मीदों पर एतवार क्या होता है 

यूँ तो सब को फ़िक्र अपने जज्बातों की है 

मगर वो जो हो चूँकि हैं बेज़ार उनका क्या होता है 

ठुकरा तो मैं भी दूँ मेरी ख़्वाहिशों को जो अधूरी रह गईं हैं 

मगर मैं उन्ही का ही तो हूँ तलबगार सो आख़िरकार क्या होता है



किसी पुराने कर्ज की तरह थे हम 

जो उन्होंने अब उतार दिया है 

ग़ैरों की है अब उन्हें तलब 

इसलिए उन्होंने 

ये इस बार किया है 

तमाशा ना बन जाएँ 

हम उनके इश्क़ का कहीं 

लिहाजा हमने भी अपनी

 ख्वाहिशों को मार दिया है 


जो दिल के बेहद करीब है उससे हमदर्दी है 

और जो नजरों से गिर जाये उससे नफ़रत रहती है  

काँटों से करता हूँ इश्क़ मैं तभी फूलों को हैरत रहती है 

मजबूर हूँ मैं अपने किरदार से जो मेरी ये अजीब सी फ़ितरत रहती है 


कोई और था कल उनके साथ में 

और आज कोई और दिख रहा है 

उनका इश्क़ भी इतना बिकाऊ है 

की बेहिसाब बिक रहा है 


उड़ कर एक दफ़ा ऊँची उड़ान देखना है 

उसके बाद ये कितना है ताक़तवर तूफ़ान देखना है 

ज़्यादा बड़ी ख्वाहिशें नहीं हैं मेरे दिल की 

मगर एक दफ़ा तो पूरा ये जहान देखना है


अजीब सी है बेबसी मेरी 

की वो याद बेहिसाब आता है 

दिन भी उसकी यादों में गुजरता है 

और रात भर उसका ख़्वाब आता है 


सवाल ही मत पूछिये यहाँ 

जज्बातों का जवाब नहीं मिलेगा 

कितनी टूटीं हैं नींदें रातों का हिसाब नहीं मिलेगा 

कर लो मशक्कत तुम कितनी भी इश्क़ में 

मगर यहाँ कोई ख़िताब नहीं मिलेगा 

सुकून ना होगा नसीब और इश्क़ में 

इश्क़ ही ज़नाब नहीं मिलेगा 


गुमसुम मायूस बेआवाज़ सा हूँ 

मैं ग़मों की सरग़म से 

सजा हुआ साज सा हूँ 

पढ़ लो ख़ुद ही तुम मेरे जज्बातों को 

जो मैं भी तो एक अल्फ़ाज़ सा हूँ 

अपनी मौज में मस्त मैं अपने अंदाज़ का हूँ 


ज़हर ही ज़हर है ये ऐसा शहर है 

सुकून तो है ही नहीं 

यहाँ बस क़हर ही क़हर है


माफ़ नहीं किया है तुम्हें 

बस समझ लो की नज़रंदाज़ किया है 

तुमसे तो मेरा कोई ताल्लुक ही नहीं था 

मैंने तो बस मेरा ही लिहाज किया है 


बिखर चुके जज़्बातों का मैं वजूद लिखता हूँ 

इन्हीं में कहीं तू भी है मौजूद लिखता हूँ 

दफ़्न कर चुका हूँ मैं कितने ख़्वाब 

और कितने सहेज कर रखा हूँ ताबूत लिखता हूँ 

कुछ मायनों में प्यार को प्यार लिखता हूँ 

कुछ मायनों में ये कितना है बेकार उसके सबूत लिखता हूँ 

कुछ मायनों में लिखता हूँ मैं ये कितना है जर्ज़र 

तो कुछ में ये कितना है मज़बूत लिखता हूँ 


हाँ मुझमें कमियाँ बहुत सी हैं 

झूठे दिलासों के साथ साथ 

 ग़लतफ़हमियाँ बहुत सी हैं 

अक्सर दायरे में ही रहता हूँ 

मैं इस जमाने से 

क्यूँकि मेरी तनहाइयों 

में ही दुनियाँ बहुत सी हैं 


गिरते संभलते तुम संभलना सीख जाओगे 

सफ़र जो तुमने जारी रखा तो एक दिन चलना सीख जाओगे 

हिम्मत चाहिए हालातों से लड़ने में जो हिम्मत ना हारे तुम

 तो हालातों को हाथों से बदलना सीख जाओगे 


उजड़ गए हों जब ख़्वाब ही बेवजह 

तो फिर नींदों का अहसान नहीं चाहिए 

तोड़ कर उम्मीदें वो मुंह फेर ले जो 

तो फिर उसका नामो निशान नहीं चाहिए 

मंजिल दूर भी है अगर तो सफ़र लंबा ही सही 

मगर रास्ते मुझे आसान नहीं चाहिए 

और उस सफ़र में दो  चेहरों के इंसान नहीं चाहिए 


जैसा तुम सोच रहे हो ऐसी कोई बात नहीं है 

बस जरा सा खामोश हूँ मैं मेरी आँखों में कोई बरसात नहीं है 

गुज़र गया जो लम्हा उसे मैंने भी भुला दिया है 

अब उस मसले पर भी मेरे ज़हन में कोई सवालात नहीं है 


ये फ़ैसला भी अब मेरे हालात में होगा 

मुझे देखना है की कौन मेरे साथ में होगा 

किसकी ख़िलाफ़त होगी मुझसे 

और किसका हाथ मेरे हाथ में होगा 

किससे किनारा हो जाएगा मेरा 

और कौन दिन रात मेरे साथ होगा 


पापी हूँ मैं जो मैंने इतने पाप किए हैं 

कहाँ से बेक़सूर हुआ मैं 

सारे तो अपने ख़िलाफ़ किए हैं 


क्या ही करूँ मैं जिक्र की कैसा हाल चल रहा है 

कश्मकश से घिरी हुई है जिंदगी 

और हर वक्त ज़हन में मलाल चल रहा है 

बेबस हूँ मैं मेरी बेबसी से 

और दिल भी मेरा बेहाल चल रहा है 

बस इसी उम्मीद में हूँ मैं 

की सब कुछ ठीक होगा इक रोज़

 चलने दो फिर जो ये फ़िलहाल चल रहा है 

देता हूँ दिलाशा मैं खुदको हर रोज़ इस बात का 

की देखो ना कितनी तेज़ी से 

 वक़्त भी अपनी चाल बदल रहा है 


मिल जाए जो सब कुछ तुम्हें फिर भी 

कोई कमी तुम्हें खाएगी 

मिट जाओगे तुम भी उन ख्वाहिशों के ढेर में 

देखना तुम्हें एक रोज़ कोई ग़लतफ़हमी सताएगी 


मेरे इतने करीब वो आई की 

उसके हर ग़म दिखने लगे 

दूर से दिखी थी उसकी आँखों में नमीं 

मगर जब वो पास आई तो 

उसके ज़ख्म दिखने लगे 

हालात तो जर्ज़र थे हमारे भी 

मगर उनसे मिले हम जब से 

उनपर कितने हुए हैं 

सितम हम लिखने लगे 


जाने दे ना ऐ जिंदगी अभी 

कुछ भी सही नहीं चल रहा है 

जैसा सोचा था मैंने 

जिसकी उम्मीद थी मुझे 

वो भी नहीं चल रहा है 

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