मेरे ख्याल ❤️📒✍️

 अहमियत ही ना हो जहां किरदार की 

वहाँ से तो किनारा ही ज़रूरी होता है 

कोई किस कदर अपना  है ये जानने को 

बस एक इशारा ही ज़रूरी होता है  

यूँ तो महज़ कहने की बात है 

की जीना मुमकिन नहीं है तुम्हारे बिना 

मगर हक़ीक़त तो ये है कि 

उसके बिना भी गुज़ारा ज़रूरी होता है 

इत्तफ़ाक़ से कुछ राज बे- राज हो जाते हैं

सच कहूँ तो ऐसा इत्तिफ़ाक़ भी दोबारा ज़रूरी होता है 

कुछ तिनके भी काम आ जाते हैं मुसीबतों में 

इसलिए डूबते को तिनके का सहारा ज़रूरी होता है 


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तोड़ कर के दिल वो फ़रार हो गया है 

मजबूर हूँ मैं की उससे प्यार हो गया है 

हर अदा उसकी बेवफ़ाओं सी है 

मगर फिर भी ये दिल 

उसका तलबगार हो गया है 

झूठ हो या सच हो वो बातें उसकी 

उसकी हर बात पर इसे एतबार हो गया है 

सुना है कि वो कातिल है कितनो के शुकून का 

इतेफ़ाक़ ही तो है की शुकून मेरा भी खो गया है 

लाख शिकायतें करो तुम उसकी मुझसे आकर 

मगर अब तो उसके इश्क़ का मुझपे जुनून हो गया है 

टूट जाऊँ या बिखर जाऊँ मैं उसके प्यार में मुझे अब परवाह नहीं

उससे प्यार जो बेशुमार हो गया है 

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चाहत थी जिसे पाने की मिला वही नहीं था 

सच कहूँ तो मेरा मुक्कद्दर सही नहीं था 

ढूँड़ने पर मिल जाते हैं भगवान एक कहावत है 

मैंने भी ढूँडा मगर वो कहीं नहीं था 


पूछते ही नहीं हो तुम और मैं बताता भी नहीं हूँ 

टुकड़ों में बिखर रहा हूँ मैं मगर जताता नहीं हूँ 

बेरुख़ी नहीं है मेरी और नहीं है कोई ख़फ़ा नाराज़गी तुमसे 

बस चाहत ही है इतनी की तुम्हें सताता नहीं हूँ 


रास्ते तो और भी थे तुझे पाने के

हक़ तुझपर अपना जताने के 

मग़र दिल ने कहा चल जाने दे 

टूटने दे तू तेरी ख्वाहिशें 

और वो ख़्वाब भी तू जल जाने दे 

नहीं हो सकती अब उससे वफ़ा 

सो उसे इस दफा तू बदल जाने दे 


घुटने नहीं टेके अभी मैंने हालातों के ख़िलाफ़ 

तो हर दफ़ा मैदान ए जंग मैं लड़ा हुआ हूँ 

कैसे मान लूँ हार जब इन ठोकरों से ही मैं खड़ा हुआ हूँ 

कहाँ सता सकीं हैं मुझको ये ठोकरें 

इन ठोकरों को सता कर ही मैं बड़ा हुआ हूँ 


ज़िन्दगी वो गुलज़ार है 

जहाँ कोई फूल बनकर आता है 

कोई फ़िज़ूल बन कर आता है 

किसी की फ़ितरत में होती है बेवफ़ाई 

तो कोई वफ़ाओं का उसूल बन कर आता 


बेरहम सी हैं ये धड़कने जो हर पल मुझको सताती रहती हैं 

मालिकाना हक़ ये हर किसी पर जताती रहती हैं 

बोर हो गया हूँ मैं अब इस जिंदगी की बेरुखी से 

बड़ी बेमुरौत है ये जिंदगी जो हर मोड़ पर जुल्म ढाती रहती है 


मायूसी भरी आँखों में टूटे ख़्वाब लेकर बैठा हूँ 

समेटकर मैं दर्द दिल में उसकी ख़ातिर गुलाब लेकर बैठा हूँ 

नहीं रहा मैं हिस्सा अब उसकी यादों का 

मगर उसकी मैं यादों की किताब लेकर बैठा हूँ 

पूछे तो कोई मुझसे मेरी मोहब्बत 

जोड़ जोड़ कर मैं पूरा हिसाब लिए बैठा हूँ 


फिर एक भूल हम इस बार कर बैठे हैं 

बेफ़िज़ुल में हम जो तुमसे प्यार कर बैठे हैं 

नहीं हो सकती अब इसमें कोई रियायत 

इश्क़ में जो हम इकरार कर बैठे हैं 


मेहरबानी करके तुम ये सवाल मत पूछना 

की हमसे हमारा तुम हाल मत पूछना 

कितनी मशक्कत से गुजारा तुम ये साल मत पूछना 

किस किस ने बिछाया था तुम जाल मत पूछना 

क्या ,क्यों ,कौन तुम ये फ़िलहाल मत पूछना 


कोई इतना बेवफ़ा कैसे हो सकता है 

या इस क़दर वो ख़फ़ा कैसे हो सकता है 

समझता है ना वो मुझे 

और मेरी खामोशी को

तो फिर देकर मुझे वो मायसी 

ऐसे दफ़ा कैसे हो सकता है 


इश्क़ में मुक़्क़मल कोई मुक़ाम नहीं होता 

वसवसे हैं बस यहाँ बेसब्री के 

जिसका मुक़्क़मल कोई अंजाम नहीं होता 

टूट जाती हैं यहाँ नींदें और उम्मीदें भी बिखर जाती हैं

इसके सिवा इश्क़ में और कोई काम नहीं होता 


तकलीफ़ होती है 

ज़ब दिल तोड़ कर 

यूँ ही ज़ख्म लाईलाज दिया जाता है 

करके गुमराह फिर इश्क़ में 

इसको नज़रंदाज़ किया जाता है 

उजाड़ कर हर ख्वाहिश 

इस दिल की इसको बेआवाज़ किया जाता है 

इसी बेरहमी या ग़लतफ़हमी 

को इश्क़ में नाम-ए-रिवाज़ दिया जाता है 


अफ़सोस इस बात का है 

की हम उनके खास नहीं हैं 

नज़दीकियाँ मात्र हैं उनसे 

उनके इतने भी पास नहीं हैं 

तलब सुकून या समझो की 

हम उनकी तलाश नहीं हैं 

फिर भी हौसला है बुलंद उन्हें पाने का 

उनकी तमाम बेरुखी के 

बावजूद भी हम हताश नहीं हैं 


किस कदर है इस दिल को तुम्हारी

 मैं तलाश लिखने लग जाता हूँ 

हाथ में कलम लेकर तुम्हारे

 मैं एहसास लिखने लग जाता हूँ 

साथ में बिताए वो लम्हें और 

ख्वाहिशों की मैं दरख़वास लिखने लग जाता हूँ 

लिखता हूँ तुम्हारी मैं यादें और 

बातें खासमखास लिखना लग जाता हूँ 

मूँदता हूँ अपनी आँखें और 

तुमको अपने पास लिखने लग जाता हूँ 


कलम उठा कर उसे मैं 

आख़िरी सलाम लिखना चाहता हूँ 

हाल ऐ दिल नहीं मेरा मैं उसको 

बस ये पैग़ाम लिखना चाहता हूँ 

वो मेरा ना हो सका ये बदनसीबी है मेरी 

मगर उसका हूँ मैं उसे ये पयाम लिखना चाहता हूँ 

हर लफ़्ज़ हर नब्ज़ और ये नफ़्ज़ 

मैं अपनी उसी के नाम लिखना चाहता हूँ 



शोर ना करें कहीं ये खामोशियाँ

इसलिए लिखना पड़ता है

हाल ऐ दिल पिरोना लफ़्ज़ों में

सीखना पड़ता है

कुछ दर्द लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं होता

तो फिर मज़बूर होकर चीखना पड़ता है



उसके हर लहज़े का हमने ख्याल रखा है 

उसकी ज़्यादती को भी हमने संभाल रखा है 

अहमियत दी है उसकी ख्वाहिशों को अक्सर 

अपनी ख्वाहिशों को मैने अभी टाल रखा है 

इश्क़ ये उसका अजीब ही कश्मकश है 

और मैं भी अजीब हूँ जो खुदको ही 

मैंने इस कश्मकश में डाल रखा है 


चल दिए ठुकरा कर तुम हमें 

एक दफ़ा तुम्हें ठहरना चाहिए था 

किस हालत में था मेरा दिल 

हाल ए दिल मेरा

तुम्हें समझना चाहिए था 


आया हूँ अधूरी सी मैं बात लेकर 

आँखों में अधूरी मैं रात लेकर 

मालूम है तुम पूछोगे सबूत मुझसे 

इसलिए आया हूँ मैं वो काग़ज़ात लेकर 

साथ में हुई थी जो वारदात लेकर 

जर्जर जो हो चुके थे वो जज़्बात लेकर 


तेरे एहसास में जी रहा हूँ 

या तेरी तलाश में जी रहा हूँ 

सहेज कर तेरी ख्वाहिशों 

तेरी आस में जी रहा हूँ 

एक दिलासा दे रखा है दिल को मैंने 

इसी झाँसे से की तेरे पास में जी रहा हूँ 


इकलौता मैं नहीं था उसके दिल में

वहाँ तो पूरी आशिक़ों की आबादी थी 

ग़ुमराह कर रखा था उसने सबको 

उसका शौक़ ही आशिक़ों की बर्बादी थी 

फ़ना थे सब बेख़बर उस बेरहम पर 

यही वजह है की उसे दिल तोड़ने की आज़ादी थी 


फ़िसलन भरा है रास्ता 

यहाँ ख़ुद को संभालना पड़ता है 

बदलती नहीं हैं परिस्थितियाँ 

यहाँ ख़ुद को ढालना पड़ता है 

कितने ही हों पेंचीदा ये रास्ते 

यहाँ रास्ता ख़ुद को निकालना पड़ता है 

मंजिल इतनी आसान नहीं 

यहाँ ख़ुद को जोखिम में डालना पड़ता है 


दिखावा मत करना सबकी तरह तुम 

करना तो मुक्कमल मुझसे प्यार करना 

इशारों की समझ इतनी नहीं है मुझमें 

इसलिए मेरा हाथ पकड़ कर 

अपने होठों से इज़हार करना तुम 

साज़िशें तो जरा भी पसंद नहीं मुझको

सीधा सीने पर वार करना तुम 


कोई तो होगा जो मेरे अल्फ़ाज़ समझता होगा 

लिखता हूँ मैं कितनी शिद्दत से 

वो मेरा लिहाज समझता होगा 

समझ होगी उसे जज्बातों की 

जो इश्क़ में वफ़ाओं का रिवाज समझता होगा 

हर किसी में नहीं है समझ जो समझ सके 

खामोशियों की ज़ुबान मगर कोई तो होगा 

जो खामोशियों के हर राज समझता होगा 

क्या कहती हैं खामोशियाँ

जो खामोशियों के अंदाज़ समझता होगा 


उजाड़ कर मेरी खुशियाँ 

मुझे इश्क़ में बंजर किया गया है 

लफ़्ज़ों में ना हो सकेगा वो बयाँ 

जो मेरे साथ में मंजर की गया है 

अँधेरे में रखकर झूठे दिलासों में 

मेरे जज्बातों को 

इश्क़ में जर्ज़र किया गया है 

अपना समझ कर जिसको मैंने दिल में बसाया था

उसी के हाथों हमें आज बेघर किया गया है 

तौफ़े में हमने दिया था गुलाब जिनको 

उनकी तरफ़ से हमें तौफ़े में 

आज ये ख़ंजर दिया गया है


दिल के करीब है वो अगर 

तो उसे जाने मत दो 

जाना ही चाहता है अगर वो 

तो उसे अब बहाने मत दो 

ये दिल तुम्हारी अमानत है 

इसे महफ़ूज़ रखो तुम 

उसे सताने मत दो 

राब्ता रखो उससे 

मगर चंद फ़ासलों पर 

ज़्यादा क़रीब उसे तुम आने मत दो 

हमदर्दी इस जमाने में एक ग़लतफ़हमी है 

सो इसे बेवजह किसी और  को जताने मत दो 


नहीं समझ सकता कोई तुम्हें 

और किसको समझाना चाहते हो तुम 

ये नासमझ लोग नहीं समझते इशारे तुम्हारे 

 तुम इशारों में जो भी जताना चाहते हो 

क्या है कमी तुम्हारी जिंदगी में 

जो बिलावजह तुम वो फलाना चाहते हो 

क्या वाजिब नहीं वो शुकून जिसे तुम 

बेवजह गँवाना चाहते हो 

क़ातिल हैं ये लोग जज्बातों के 

झूठी बातों में इनकी क्यों तुम आना चाहते हो 

और समझ से परे हैं इनके रश्म-ओ-रिवाज इश्क़ के 

किस वहम से तुम इश्क़ सूफियाना चाहते हो 


फ़ितरत तू तेरी हर बार बदलता रहा 

नज़रों से छुप छुप कर 

तू किरदार बदलता रहा 

हर वादे से मुकर गया तेरे 

तू यार हर बार बदलता रहा 

बदलने लगे तेरे तरीके सभी 

और तेरा हर वार बदलता रहा 

जायज़ थी इश्क़ में बेवफ़ाई 

जो इश्क़ में हर रोज़ 

यहाँ उम्मीदवार बदलता रहा 

मुद्दतों से हमने तो कपड़े भी ना बदले 

जिस तरह हर रोज़ 

तू अपना प्यार बदलता रहा



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