दिल के अल्फ़ाज़ ✍️📒❤️

 उस गली से गुज़रने को ये दिल बेताब रहता था 

ढल जाती थी जब शामें तो इन आँखों में उसका ख़्वाब रहता था 

उसकी तलब इस क़दर थी दिल को 

की उससे मिलने को ये दिल बेहिसाब रहता था 

ढूँड़ता था उसे ख्वाबों में दिल जो हाथों में इसके गुलाब रहता था 


हम ना मिलेंगे हमारे अल्फ़ाज़ मिल जायेंगे 

हमारी खामोशियों में जो क़ैद थे तुम्हें वो राज़ मिल जायेंगे 

ना कर सके जो बयाँ हम अब तलक तुम्हें वो हमारे अल्फ़ाज़ मिल जायेंगे 

ढूंड रहे हो जिन सवालों के जवाब तुम इतने दिनों से 

मेरी आँखों में तो देखो तुम्हें वो सारे आज मिल जाएँगे 


तुम आँखों से बताया करो 

नाराज़गी हो भी अगर 

तो इशारों में जताया करो

नहीं लगता ये दिल 

तुमसे दूर हो कर 

कितनी भी हो तुम ख़फ़ा 

यूँ छोड़ कर ना जाया करो  


मुक़्क़मल ना हो सक़ी 

वो दास्ताँ अधूरी रह गई 

कर भी ना सके हम 

वो बयाँ जो मज़बूरी रह गई 

अक्स थी जो मेरी रूह की 

उससे ही मिलों की दूरी हो गई 

नफ़रत थी जिन तनहाइयों से 

वही अब ज़रूरी हो गई 


कितनी भी कर लो जासूसी 

मगर तुम समझ नहीं पाओगे 

कितनी है मायूसी मेरी ख़ामोसी में  

तुम समझ नहीं पाओगे 


देर से ही सही

एक रोज़ तुम आओगे 

अपनी उस खता पर 

एक रोज तुम पछताओगे 

ढूंड लो चाहे कहीं भी कोई भी ठिकाना 

पर देखना तुम आशियाना तो 

इस दिल में ही बनाओगे 


एक अधूरी सी आस 

अभी भी बाक़ी है 

उसकी यादें उसके अहसास

 अभी भी बाक़ी है 

मौज़ूद है वो मेरे अक्स में 

ज़ब तलक मेरे सीने में 

साँस कहीं बाक़ी है 


उसकी नफ़रत कैसी होनी चाहिए 

या फिर उसका प्यार कैसा होना चाहिए

तुम्हारी समझ से बताओ की 

हर शख़्स का किरदार कैसा होना चाहिए 


उसको देख कर हैरानी होती है 

की यार ऐसा कैसे हो सकता है 

अरसों बाद मिला वो अजनबी 

हम जैसा कैसे हो सकता है 


ये तय था की फ़ासला ही मुक्कमल होगा 

लेकिन ये फ़ैसला तय नहीं था 

की आज होगा या कल होगा 


तुम जैसा कोई और नहीं 

हम जैसे मालूम हैं बहुत हैं 

उनसे नहीं होती है जालसाज़ी 

हम जैसे मासूम बहुत हैं 


मत करना मेरा इंतज़ार तुम 

मैं आ नहीं सकूँगा 

कैसी उलझन में फँसा हूँ

मैं आकर समझा नहीं सकूँगा 


गुनगुनाते रहना हर पल इसे ये जिंदगी भी एक गाना है 

साज है ये खुशियों का और ग़मों का ये तराना है 

मंजिल नहीं है इस सफ़र की ना ही कोई ठिकाना है 

महफ़िल है ये चार दिन की फिर इसे छोड़ कर जाना है 


तुम जमाने की बातों में मत आया करो 

बातें जो भी हों तुम्हारे दिल में

बामोहलत उसे तुम आ कर बताया करो 

शक से ढह जाते हैं ढाँचे इश्क़ के 

इसलिए जिस बात पर हो एतराज तुम्हें 

वो बात तुम ख़ुद ही आकर समझाया करो 


लिखता हूँ जब भी मैं चुन चुन कर उसके एहसास लिखता हूँ 

यादें पिरो कर उसकी अल्फ़ाज़ों में 

हर लफ्ज़ बेहद खास लिखता हूँ

तुममें नहीं है समझ समझने की बस 

वरना मैं तो प्यार से प्यार का सरांस लिखता हूँ 


आँखों में मूँद लेते हो कितनी रातें 

और खामोशियों में कितनी बातें बंद कर देते हो 

कहाँ से सीखा है ये नायाब तरीका जरा मुझे भी बताओ ना 

कैसे इन आँखों  में इतनी बरसातें नज़रबंद कर लेते हो


लफ्ज़ ख़ामोश रह गए वो अल्फ़ाज़ न बन सके 

लाख कोशिशों के बावज़ूद वो मेरी आवाज़ न बन सके 

कैसे करते हम बयाँ हाल-ए-दिल उनसे 

जिनको भी अपनाया वो मेरे हमराज़ न बन सके 


अजीब था मैं जो उसमें कहीं मेरा क़िरदार ढूँड रहा था 

बेतुक़ी सी एक कहानी का मैं सार ढूंड रहा था 

उसकी आँखों में तो नफ़रत ही नफ़रत भरी थी 

जिसकी आँखों में कहीं मैं प्यार ढूंड रहा था 


फिर कुछ खास होने लगा था 

मौजूद थी वो मुझमें कहीं

उसके वजूद का एहसास होने लगा था 

मिटने लगे थे फिर फ़ासले सभी 

वो इतनी पास होने लगा था 


झूठी तसल्ली ना देना हमें 

बेशक तुम चाहो तो मार देना 

खंजर चलाना तुम सीने में अगर

तो नक़ाब ये हमदर्दियों का तुम उतार देना 


तेरी यादों की गिरप्त में 

मेरे दिन रात कट रहे हैं 

उसपर ये तेरी बेरुखी 

जिसकी हथकड़ियों में जकड़ कर 

मेरे जज़्बात सिमट रहे हैं 


तेरे आग़ोश में आकर मैं बेहोश सा हो जाता हूँ 

या यूँ कहूँ की तेरी मदहोशी में मैं भी मदहोश सा हो जाता हूँ 

हो जाता हूँ आवारा तेरे इश्क़ में और ख़ानाबदोश हो जाता हूँ 

इक पल भी तू जो होती है मायूस तो ख़ुद मैं भी ख़ामोश हो जाता हूँ 


इश्क़ में हारा हूँ मैं 

फिर भी तुम्हारा हूँ मैं

बेशक आवारा हूँ मैं 

फिर भी तुम्हारा हूँ मैं

तुम समंदर हो अगर

तो किनारा हूँ मैं 

फिर भी तुम्हारा हूँ मैं


हिस्से में तुम्हारे बेशक यार बहुत थे 

हर कमीं में तुम्हारी बेशक तलबगार बहुत थे 

समझते थे जो इशारे तुम्हारे समझदार बहुत थे 

फिर भी तुम मायूस क्यों हो तुम्हारे तो प्यार बहुत थे 


मत पूछ मेरे दिल का क्या 

हाल चल रहा है 

उसकी बेरुखी का ही हर पहर 

मलाल चल रहा है 

बरस रही हैं आँखे ये उसका ही 

कमाल चल रहा है 

उसकी यादों की चिंगारी से 

मेरा दिल फ़िलहाल जल रहा है 

मन ही मन में मेरे बस 

एक ही सवाल चल रहा है 

की वो बेवफ़ा भी है अगर 

तो इसमें इतना क्यों बवाल चल रहा है 

इश्क़ भी तो एक सतरंज ही है 

जिसमें बाजी उसकी है 

वो अपनी चाल चल रहा है 


तुम्हारी ख़ुशी है इसमें यही सोच कर 

मैं अपना जीना दुश्वार कर लेता हूँ 

मालूम हैं वो सारे झाँसे हैं और झूठे दिलासे हैं 

मगर फिर भी मैं उसपर ऐतबार कर लेता हूँ 

कितनी भी फ़रेबी बेरहमी या बेवफ़ा हो तुम 

दिल इस कदर तुम पर फ़िदा है की 

मैं भुला तुम्हारी हर खता तुमसे प्यार कर लेता हूँ 

कोई कितनी भी दे सफ़ाई या गवाही ख़िलाफ़त में तुम्हारे 

मैं आँख मीच कर सभी को इनकार कर देता हूँ 


क्या ही कहूँ की तेरा इश्क़ में क्या अंजाम होगा 

बेक़सूर निकलेगी वो , तेरे सर पर सारा इल्ज़ाम होगा 

इश्क़ में तू उसके बेवजह ही बदनाम होगा 

ज़लील होगा हर दफ़ा तू इश्क़ में 

बस इतना ही तेरा काम होगा 

ख्वाहिशें खुदकी तू दफ़ना कर 

उसकी ख्वाहिशों की ख़ातिर तू नीलाम होगा 

छोड़ देगी तुझे एक रोज़ वो एक मोड़ पर 

उसके बाद तेरा जीना हराम होगा 

रातों में रोना आँखें भीगोना 

उसके बाद  ये तो आम होगा 


चंद लफ्ज़ कहने दो मैं पूरी बात कह जाऊँगा 

तुम सुनो जो अगर तो मैं पूरी वारदात कह जाऊँगा 

किस्से कहानी में जो सिमट कर रह गई 

मैं वो अधूरी मुलाक़ात कह जाऊँगा 

कब कैसे क्यों बिगड़े थे उससे 

मैं ताल्लुक़ात कह जाऊँगा 

दिलचस्पी है जो तुम्हें जरा भी सुनने में 

तो मेरी आँखों में भरी है कैसे 

मैं ये बरसात कह जाऊँगा 


दिल में बेहद ग़म भरे हुए हैं 

हाल ए दिल बताने से डरता हूँ मैं 

जो जमाने में बेहद बेरहम भरे हुए हैं 


दूर होकर हमारी यादों से 

सच बताओ क्या गुजारा मुमकिन है 

हम भी कर लेंगे बसर 

जो अगर तुम्हारा मुमकिन है 


हर पल मुझे तेरी कमीं महसूस हो रही है 

यही वो वजह है जो आँखों में नमी महसूस हो रही है

सहमी हुई हैं ये धड़कने और ये साँसे मायूस हो रही हैं 


इश्क़ में दरबदर से हम ठुकराये हुए हैं

यही वजह है जो इश्क़ से हम घबराए हुए हैं 

मुक़्क़मल नहीं होतीं यहाँ दुआएँ साहब 

ख़ाली हाथ ही हर दफ़ा वहाँ से आए हुए हैं 


मिल जाऊँगा किसी मोड़ पर

मैं इसी आस में रहता हूँ 

खुदसे ही क्यों हैं इतने फ़ासले 

जबकि मैं खुदके पास रहता हूँ 


दिल ने कहा चल जाने दे 

जो छोड़ गए वो बेगाने थे 

वफ़ा नहीं थी दिल में उनके

नियत में साफ़ बहाने थे 


फ़ुर्सत में मिले कोई मुझे 

तो उसको मैं एक काम दूँगा 

गुमसुदा हूँ मैं ,ढूँड़ना है बस मुझे 

जो मिल गया कहीं 

तो उसे मैं इनाम दूँगा 


पूछने दो मुझसे हाल ऐ दिल मेरा 

कई और नहीं अब ये हक़ भी अदा करने को

ख़ुद ही मलाल ख़ुद ही सवाल 

कोई और नहीं यहाँ अब शक अदा करने को


नहीं चाहिए मुझे दस्तावेज़ लिखत में 

मैं तो तुम्हारी आँखों से जवाब मांगूँगा 

न्ही चाहिए तुम्हारे हमदर्दी भी 

मैं तो मेरे उजड़े हुए उन ख्वाबों का हिसाब माँगूँगा 


मंज़िल एक है तो बहाना क्या 

मौत मुक़र्रर है तो घबराना क्या 

चाहत है जो शिद्दत की 

तो रूह भी उसको सौंप दूँ 

पर बेरुख़ी जो हुई उससे 

तो कौन जाने फलाना क्या 


बातें बनाना या फिर छुपाना कोई तुमसे सीखे 

इश्क़ में बहाना या ठुकराना कोई तुमसे सीखे 

झूठे दिलासे या फिर झूठा फ़साना कोई तुमसे सीखे 

इश्क़ में साज़िशें या सताना कोई तुमसे सीखे 

झूठ को सच सा बताना कोई तुमसे सीखे 

बेवफ़ाई में तुम हो सबसे अव्वल 

बेवफ़ाई का हलफ़नामा कोई तुमसे सीखे 

हमदर्दियों का झूठा नजराना कोई तुमसे सीखे 

करके गुमराह छोड़ कर जाना कोई तुमसे सीखे


अजीब हूँ मैं जो हर शख़्स पर 

ऐतवार कर लेता हूँ

वो आए ना आए 

मैं इंतज़ार कर लेता हूँ 

नहीं है मुझमें कोई ग़ुरूर या ख़लिश 

कोई नफ़रत भी करे मुझसे 

तो उससे मैं प्यार कर लेता हूँ 

मेरे अपने तौर तरीके हैं ज़िन्दगी के 

इन्हीं तौर तरीकों से मैं 

अपनी ज़िंदगी गुजार लेता हूँ 

कभी समझौते से काम चल जाता है 

तो कभी ख्वाहिशें अपनी मैं मार देता हूँ 


एक तो तुम्हारी बेरुखी 

और दूसरी हम ये अफ़वाह बनाये बैठे थे 

तुम्हारी बग़ैर इजाज़त 

दिल में तुम्हारी जगह बनाये बैठे थे 

नहीं हो सकती वो  मुक़्क़मल 

जो ख्वाहिशें हम बेवजह बनाये बैठे थे 

मन ही मन हम तुमसे मिलने की चाह बनाये बैठे थे 


अहमियत ना थी मेरी वहाँ 

इसलिए मैंने जाना छोड़ दिया 

मुड़ कर ना पड़े फिर क़दम 

जहाँ का मैंने ठिकाना छोड़ दिया 

बेरुख़ी इस क़दर थी तुम्हारी 

की हाल ए दिल मेरा मैंने जताना छोड़ दिया 

मुंह फेर लिया मैंने तुम्हारे साये से 

और तुमसे दिल लगाना छोड़ दिया

नहीं रहा मेरा अब तुमसे कोई ताल्लुक 

इसलिए तुमको मैंने कुछ भी बताना छोड़ दिया 

छोड़ दी आशिक़ी और वो वहम पुराना छोड़ दिया 


एक क़लमकार हूँ मैं सो  क़लमकारी करता हूँ 

पिरो कर जज्बातों को 

अल्फाजों में अदाकारी करता हूँ 

फ़ैसला तुम पर है ये तय करो 

की क्या मैं समझदारी करता हूँ 

बेच कर मैं अपनी समूची ख़्वाहिशें 

चंद पलों की इश्क़ में ख़रीददारी करता हूँ 


कैसे होतीं इश्क़ में उससे नज़दीकियाँ 

वो तो ख़ुद ही हमसे दूरियाँ बनाये बैठा था 

कैसे मनाता मैं भला उसे 

वो जो बेवजह ही मुंह फुलाये बैठा था 


तुम मेरे हो मैं ये दावा नहीं कर सकता 

हक़ीक़त यही मैं दिखावा नहीं कर सकता 

तुम समझो बात को मेरी 

मैं छलावा नहीं कर सकता 

तुम ही हो अगर मेरे तो इश्क़ भी 

तुम्हारे अलावा नहीं कर सकता 


आज़माता रहा वो मुझे 

और मैं भी इम्तिहान देता रहा 

उसकी चंद ख्वाहिशों की ख़ातिर 

मैं खुदकी जान देता रहा 


भारत तो झूठे झाँसों का देश है 

झूठी उम्मीदें झूठे दिलाशों का देश है 

उन्नति के नाम पर बस वहम है यहाँ 

ये देश महज़ खेल तमाशों का देश है 


एहसानमंद समझ लो या ख़ुदगर्ज़ी समझ लो

ख़ुद्दार समझ लो या फ़र्जी समझ लो 

कोई एतराज नहीं मुझको तुम्हारे समझने से

जैसा समझ आये तुम्हारी मर्ज़ी समझ लो 


कभी फ़ुरसत मिले तो तुम मेरा एक काम कर देना 

नहीं बिक रहा है.तुम मेरा ये ग़म नीलाम कर देना 

लौटा दूँगा मैं तुमको तुम्हारी मोहब्बत भी 

बस मेरा दिल तुम मेरे नाम कर देना 



ना हो सकीं बयाँ खामोशियाँ 

वो राज राज ही रहे 

नहीं समझ सके तुम जज़्बात इनमें 

ये अल्फाज़ अल्फ़ाज़ ही रहे



एक शख़्स पर खुदको फ़ना कर बैठा था

उसकी बग़ैर मर्जी मैं इश्क़ बेपनाह कर बैठा था 

कायदे से कहूँ तो मैं गुनाह कर बैठा था 

जो बहवाजह ही इश्क़ मैं इस तरह कर बैठा था i



ख़ुराफ़ातें हैं मेरी ख़ामोशियों की 

जो आज अल्फ़ाज़ों में उतर आयीं हैं

ज़्यादा मत करना गौर तुम

इन लफ़्ज़ों में खाई सी गहराई है 



महफ़ूज़ हैं हम अकेले ही

ये इश्क़ का चस्का मत लगाओ 

बाक़ी बातें तो बाद में

यूँ हर बात में मस्का मत लगाओ 



छूट कर तुझसे तेरी यादों में जी रहा है 

अजीब है ये अभी भी तेरे वादों में जी रहा है 

नक़ाब ओढ़ कर इश्क़ का 

ये फर्जी लबादों में जी रहा है 

इश्क़ का मारा ये कमबख़्त 

तेरी फ़रियादों में जी रहा है



नहीं थमेगा लम्हा 

ये अफ़साने यूँ ही चलते रहेंगे 

होंगी बयानबाज़ियाँ भी इश्क़ में मगर

ये बहाने यूँ ही चलते रहेंगे 

हिस्सेदार हैं सरकार ही  मयखानों की 

इसलिए बंद होंगी दवाईयां 

मगर मयखाने यूँ ही चलते रहेंगे 



ये आख़िरी बार मैं पुकार रहा हूँ 

ऐ जिंदगी मैं हार रहा हूँ 

नहीं चाहिए मुझे ये बोझ अब और 

मैं अपनी ख्वाहिशें भी मार रहा हूँ 



उससे बिछड़ने का मलाल फ़िलहाल चल रहा है 

इश्क़ में ख़ुद ही पड़ा था मैं सो ये हाल चल रहा है 

घुटन भरी हैं रातें और दिल भी ये बेहाल चल रहा है 

इश्क़ में उसने की थीं जो जफ़ाएँ 

ये उसी का कमाल चल रहा है

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