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अल्फ़ाज़ों का सिलसिला

 अहमियत ही ना हो जहां किरदार की  वहाँ से तो किनारा ही ज़रूरी होता है  कोई किस कदर अपना  है ये जानने को  बस एक इशारा ही ज़रूरी होता है   यूँ तो महज़ कहने की बात है  की जीना मुमकिन नहीं है तुम्हारे बिना  मगर हक़ीक़त तो ये है कि  उसके बिना भी गुज़ारा ज़रूरी होता है  इत्तफ़ाक़ से कुछ राज बे- राज हो जाते हैं सच कहूँ तो ऐसा इत्तिफ़ाक़ भी दोबारा ज़रूरी होता है  कुछ तिनके भी काम आ जाते हैं मुसीबतों में  इसलिए डूबते को तिनके का सहारा ज़रूरी होता है  तोड़ कर के दिल वो फ़रार हो गया है  मजबूर हूँ मैं की उससे प्यार हो गया है  हर अदा उसकी बेवफ़ाओं सी है  मगर फिर भी ये दिल  उसका तलबगार हो गया है  झूठ हो या सच हो वो बातें उसकी  उसकी हर बात पर इसे एतबार हो गया है  सुना है कि वो कातिल है कितनो के शुकून का  इतेफ़ाक़ ही तो है की शुकून मेरा भी खो गया है  लाख शिकायतें करो तुम उसकी मुझसे आकर  मगर अब तो उसके इश्क़ का मुझपे जुनून हो गया है  टूट जाऊँ या बिखर जाऊँ मैं उसके प्यार में मुझे अब...

अधूरी कहानी 😕🥲✍️

  कतरा जो अश्क का बह गया है   तुम समझे नहीं ये क्या कुछ कह गया है  तेरी ख़ातिर ही तो मैं इतने गुनाह कर रहा था  क़त्ल ख्वाहिशों का अपनी मैं बेपनाह कर रहा था  ख्वाहिश थी कलम की की कुछ खास लिखा जाये  पिरो कर शब्दों में तेरे एहसास लिखा जाये  ज़िस्म के निहायती तलबग़ार ही होते हैं  इश्क़ में भी तो यार ख़रीददार ही होते हैं  जमानत ना दो मुझे सलाखों में रहना है  मेरी तो दुनिया है वहाँ मुझे उसकी आँखों में रहना है  हर लम्हा हसीन है यहाँ इसे तुम हंस के गुजार दो  न की उलझी हुई इस जिंदगी की तुम कश्मकश में गुजार दो  नहीं है जो हमदर्दी ही दिल में तो इन दावों का क्या करूँगा  अहमियत ही ना हो इश्क़ में तो दिखावों का क्या करूँगा करनी थी जितनी बेरहमी और जितना सताना था वो सता चुका है  नहीं होगा ऐ दिल अब सितम जो था बेरहम वो जा चुका है  बस इतनी ही समझ है  सबको अपना समझ लेते हैं  क़ातिल ही था हमदर्द मैं जता नहीं पाऊँगा  मत पूछो तुम मेरा दर्द मैं बता नहीं पाऊँगा  इश्क़ में हमदर्दियों के दिखावे चलते रहते हैं वफ़ाएँ...